डंके की चोट पर फैसले लेने वाली इंदिरा की ऐसी थी कहानी

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- इंदिरा गांधी की सोमवार को 101वीं जयंती मनाई जाएगी।
- इंदिरा ने परिणामों की परवाह किए बगैर देशहित में कई ऐसे फैसले लिए जो देश को नई ऊचाइंयों तक ले गया।
आयरन लेडी के नाम से मशहूर भारत की पहली और अंतिम महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सोमवार को 101वीं जयंती मनाई जाएगी। इंदिरा गांधी को राजनीति विरासत में मिली थी। यही वजह थी कि उनके भीतर गजब की राजनीतिक दूरदर्शिता थी। इंदिरा ने परिणामों की परवाह किए बगैर देशहित में कई ऐसे फैसले लिए जो देश को नई ऊचाइंयों तक ले गया। हालांकि कुछ ऐसे निर्णय भी रहे जिनका उनकी पार्टी को राजनीतिक खामियाजा भी भुगतना पड़ा। राजनीति का ज्ञान रखने वाले लोग बताते हैं कि इंदिरा में जनता की नब्ज समझने की गजब की क्षमता थी। आइए जानते हैं बचपन से लेकर देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनने तक की उनकी कहानी।

देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी का जन्म इलाहाबाद में 19 नवंबर 1917 को हुआ था। 11 साल की उम्र में उन्होंने ब्रिटिश शासन का विरोध करने के लिए बच्चों की वानर सेना बनाई। अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद इंदिरा ने शान्ति निकेतन में रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा निर्मित विश्व-भारती विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने ही उन्हें 'प्रियदर्शिनी' नाम दिया था और इंदिरा बन गई इंदिरा प्रियदर्शिनी गांधी।

इंदिरा जब लंदन के ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में पढ़ रही थीं तो वहां आजादी समर्थक ‘इंडिया लीग’ की सदस्य बनीं। इसी दौरान वह फिरोज गांधी से भी काफी मिलने जुलने लगीं। फिरोज उस वक्त लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में अध्ययन कर रहे थे। 1938 में वह औपचारिक तौर पर इंडियन नेशनल कांग्रेस में शामिल हुईं। धीरे-धीरे इंदिरा और फिरोज का प्यार परवान चढ़ा और अंततः 16 मार्च 1942 को आनंद भवन, इलाहाबाद में इनका विवाह हुआ।

1947 से इंदिरा ने अपने प्रधानमंत्री पिता नेहरू के साथ कांग्रेस पार्टी के लिए काम करना शुरू कर दिया। इंदिरा गांधी को 1960 में कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया। 1964 में उनके पिता जवाहरलाल नेहरू की मौत के बाद लाल बहादुर शास्त्री को प्रधानमंत्री और इंदिरा गांधी को सूचना एवं प्रसारण मंत्री बनाया गया। इंदिरा को शुरू में ‘गूंगी गुडिय़ा’ की भी उपाधि दी गई थी, लेकिन 1966 में लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद इंदिरा को प्रधानमंत्री बनाया गया और तबसे इंदिरा ने अपने साहसी फैसलों से साबित किया कि वह सारे फैसले डंके की चोट पर करती हैं।

1966 में प्रधानमंत्री बनने के बाद इंदिरा एक सशक्त नेता बनकर उभरीं। प्रधानमंत्री पद ग्रहण करते ही इंदिरा गांधी ने राष्ट्र के नाम रेडियो पर पहला संदेश दिया। उन्होंने कहा था कि 'हम शान्ति चाहते हैं क्योंकि हमे दूसरी लड़ाई नहीं लड़नी है।' इसके तुंरत बाद 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध हुआ। इस युद्ध में पाकिस्तान की हार हुई और पाक सेना को आत्मसमर्पण करना पड़ा। इसके फलस्वरूप इंदिरा गांधी ने पाकिस्तानी राष्ट्रपति को शिमला समझौते पर हस्ताक्षर करवाए। फौलादी पहचान रखने वाली इंदिरा ने पाकिस्तान का भूगोल बदलकर बांग्लादेश के रूप में नया देश बना दिया।

भारत में हरित क्रांति लाने का भी श्रेय इंदिरा गांधी को ही जाता है। जिस वक्त भुखमरी और गरीबी के कारण कई लोगों की जान चली गयी थी उस वक्त इंदिरा ने खाद्य निर्यात बढ़ाने का निर्णय लिया। उनके इस फैसले की वजह से लोगों को खाना भी सही रूप में उपलब्ध हो सका और उन्हें रोजगार भी मिला। इसके अलावा इंदिरा ने अपने राजनीतिक करियर में कई ऐसे फैसले लिए जिसने देश की दशा बदल दी। इसमें बैंकों का राष्ट्रीयकरण, पूर्व रजवाड़ों के प्रिवीपर्स समाप्त करना, कांग्रेस सिंडिकेट से विरोध मोल लेना जैसे फैसले शामिल थे।

1971 के चुनाव में इंदिरा गांधी को भारी सफलता मिली थी। हालांकि विपक्षी नेताओं ने इंदिरा और कांग्रेस पर चुनाव में भ्रष्टाचार करने का आरोप लगाया। इसको लेकर जयप्रकाश नरायाण ने इंदिरा के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया। जून 1975 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने चुनावी भ्रष्टाचार के आधार पर 1971 के लोकसभा चुनाव को अवैध घोषित कर दिया। इसके बाद इंदिरा गांधी ने इस्तीफा देने की बजाय देश में आपातकाल लगा दिया। इस दौरान उन्होंने राजनीतिक विरोधियों को जेल में डाल दिया। इंदिरा की राजनीतिक छवि को आपातकाल की वजह से गहरा धक्का लगा। इसका नतीजा यह हुआ कि मार्च 1977 तक चले आपातकाल के बाद हुए आम चुनाव में देश की जनता ने उन्हें नकार दिया।

वर्ष 1975 में आपातकाल लागू करने के फैसले से पहले उन्होंने भारतीय राजनीति की मनोदशा ही बदल दी थी। इंदिरा की कामयाबियों के चलते उस समय देश में 'इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा' का नारा जोर-शोर से गूंजने लगा। इंदिरा को जानवरों से भी बहुत प्यार था। यह उनकी ही परिश्रम का नतीजा है कि भारत में वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 पास किया गया था। 1980 में एक बार फिर से कांग्रेस और इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी हुई। इस दौरान खालिस्तानी आतंकवाद के रूप में बड़ी चुनौती उनके सामने आई। ऑपरेशन ब्लू स्टार’को लेकर उन्हें कई तरह की राजनीतिक समस्याओं का सामना करना पड़ा। यही ऑपरेशन इंदिरा की मौत का कारण भी बना। 31 अक्टूबर 1984 का वो कालादिन भी आया, जब पद पर रहते हुए ही उनकी हत्या कर दी गई। इंदिरा को उनके सिख अंगरक्षकों सतवंत सिंह और बेअंत सिंह ने गोलियों से छलनी करते हुए मौत के घाट उतार दिया था।

इंदिरा गांधी एक ऐसी महिला थीं, जो न केवल भारतीय राजनीति पर छाई रहीं बल्कि विश्व राजनीति के क्षितिज पर भी वह विलक्षण प्रभाव छोड़ गईं। उन्हें आयरन लेडी के नाम से भी संबोधित किया जाता है। अपनी प्रतिभा और राजनीतिक दृढ़ता के लिए 'विश्वराजनीति' के इतिहास में इन्दिरा गांधी का नाम सदैव याद रखा जायेगा।
Source: Bhaskarhindi.com
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