हरतालिका तीज 2018: अखंड सौभाग्य के लिए करती हैं महिलाएं व्रत
डिजिटल डेस्क, भोपाल। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को चित्रा नक्षत्र में तीज का व्रत रखा जाता है। इस बार महिलाएं अखंड सौभाग्य के लिए किया जाने वाला व्रत हरितालिका तीज 12 सितंबर 2018 को करने वाली हैं। इस दिन महिलाएं अपने अखण्ड सौभाग्य, सुख एवं आरोग्यता के लिए माता गौरी का व्रत एवं पूजा करती हैं। इस दिन सुहागन स्त्रियां अखण्ड सौभाग्य के लिए और कुंवारी लड़कियां अच्छे वर की कामना के लिए व्रत करती हैं। इसके अगले दिन से गणेश उत्सव की शुरुआत होती है।
शुभ मुहूर्त
इस बार पूजा का मुहूर्त सुबह से ही है और शाम 6 बजकर 46 मिनट तक इस बार पूजा की जा सकती है।
सुहागनों के लिए विशेष है हरतालिका तीज
वैसे हरियाली तीज, कजरी तीज और करवा चौथ की तरह ही यह हरतालिका तीजा सुहागिनों का व्रत है। सुहागन स्त्रियां अपने पति की लंबी आयु के लिए यह व्रत पूर्णनिष्ठा भाव के साथ रखती हैं। ऐसी मान्यता है कि भगवान शंकर को पाने के लिए माता पार्वती ने पहली बार इस व्रत को किया था, जिसमें उन्होंने अन्न और जल ग्रहण नहीं किया था। इसलिए यह व्रत महिलाएं निर्जला रखती हैं। इस व्रत में महिलाएं भगवान शिव, माता पर्वती और गणेश जी की पूजा की करती हैं। कई अविवाहित कन्या भी इक्षित वर को प्राप्त करने के लिए यह व्रत करती हैं।
यह व्रत निर्जला किया जाता है, जिसमें महिलाएं थूक तक नहीं गटक सकती हैं। भोजपुरी सभ्यता में इस व्रत का बहुत महत्व माना जाता है, जहां महिलाएं गीली, काली मिट्टी या बालू रेत से भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश की मूर्ति बनाकर पूजा करती हैं। इस व्रत के नियम के अनुसार इसे एक बार प्रारंभ करने पर हर साल पूरे नियम धर्म से किया जाता है। इस दिन विवाहित एवं अविवाहित महिलाएं एकत्रित होकर रतजगा (जागरण) में भजन कीर्तन करती हैं।
यह व्रत निर्जला किया जाता है, जिसमें महिलाएं थूक तक नहीं गटक सकती हैं। भोजपुरी सभ्यता में इस व्रत का बहुत महत्व माना जाता है, जहां महिलाएं गीली, काली मिट्टी या बालू रेत से भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश की मूर्ति बनाकर पूजा करती हैं। इस व्रत के नियम के अनुसार इसे एक बार प्रारंभ करने पर हर साल पूरे नियम धर्म से किया जाता है। इस दिन विवाहित एवं अविवाहित महिलाएं एकत्रित होकर रतजगा (जागरण) में भजन कीर्तन करती हैं।

हतालिका तीजा व्रत कथा
एक बार भगवान शिव ने पार्वती जी को उनके पूर्व जन्म का स्मरण कराने के उद्देश्य से इस व्रत के माहात्म्य की कथा कही थी।
महादेव बोले- कि हे गौरी जब पर्वतराज हिमालय पर स्थित गंगा जी के तट पर तुमने अपनी बाल्यावस्था में बारह वर्षों तक अधोमुखी होकर घोर तप किया था। इस अवधि में तुमने अन्न जल का त्याग कर वृक्षों के सूखे पत्ते चबाकर व्यतीत किया था। माघ मास की शीतलता में तुमने निरंतर जल में ही प्रवेश करके तप किया। वैशाख मास की जला देने वाली गर्मी में तुमने पंचाग्नि में बैठकर शरीर को तपाया। श्रावण मास की मूसलधार वर्षा में खुले अम्बर के नीचे बिना अन्न-जल ग्रहण किए घोर तप किया।
तुम्हारे पिता तुम्हारी कठोर तपस्या को देखकर बड़े दुखी होते थे। उन्हें बड़ा ही क्लेश होता था। तब एक दिन तुम्हारी इस तपस्या तथा पिता के क्लेश को देखकर नारद जी तुम्हारे घर पधारे। तुम्हारे पिता ने उनका हृदय से अतिथि सत्कार कर उनके आने का प्रयोजन पूछा।
नारदजी ने कहा- गिरिराज मैं भगवान विष्णु के भेजने के कारण यहां उपस्थित हुआ हूं। आपकी कन्या ने बड़ा ही कठोर तप किया है। इससे प्रसन्न होकर वे आपकी सुपुत्री से विवाह करना चाहते हैं। इस संदर्भ में आपकी क्या राय है जानना चाहता हूं। नारदजी की बात सुनकर गिरिराज गद्गद हो उठे। उनके तो जैसे सारे कष्ट ही दूर हो गए हों। प्रसन्नचित होकर वे बोले- नारद जी यदि स्वयं विष्णु मेरी कन्या को वरण करना चाहते हैं तो भला मुझे क्या आपत्ति हो सकती है। वे तो साक्षात परम ब्रह्म हैं। सो हे महर्षि यह तो हर एक पिता की इच्छा होती है कि उसकी पुत्री सुख-सम्पदा से युक्त अपने पति के घर की लक्ष्मी बने। पिता की सार्थकता इसी में है कि पति के घर जाकर उसकी पुत्री पिता के घर से अधिक सुखी रहे।
महादेव बोले- कि हे गौरी जब पर्वतराज हिमालय पर स्थित गंगा जी के तट पर तुमने अपनी बाल्यावस्था में बारह वर्षों तक अधोमुखी होकर घोर तप किया था। इस अवधि में तुमने अन्न जल का त्याग कर वृक्षों के सूखे पत्ते चबाकर व्यतीत किया था। माघ मास की शीतलता में तुमने निरंतर जल में ही प्रवेश करके तप किया। वैशाख मास की जला देने वाली गर्मी में तुमने पंचाग्नि में बैठकर शरीर को तपाया। श्रावण मास की मूसलधार वर्षा में खुले अम्बर के नीचे बिना अन्न-जल ग्रहण किए घोर तप किया।
तुम्हारे पिता तुम्हारी कठोर तपस्या को देखकर बड़े दुखी होते थे। उन्हें बड़ा ही क्लेश होता था। तब एक दिन तुम्हारी इस तपस्या तथा पिता के क्लेश को देखकर नारद जी तुम्हारे घर पधारे। तुम्हारे पिता ने उनका हृदय से अतिथि सत्कार कर उनके आने का प्रयोजन पूछा।
नारदजी ने कहा- गिरिराज मैं भगवान विष्णु के भेजने के कारण यहां उपस्थित हुआ हूं। आपकी कन्या ने बड़ा ही कठोर तप किया है। इससे प्रसन्न होकर वे आपकी सुपुत्री से विवाह करना चाहते हैं। इस संदर्भ में आपकी क्या राय है जानना चाहता हूं। नारदजी की बात सुनकर गिरिराज गद्गद हो उठे। उनके तो जैसे सारे कष्ट ही दूर हो गए हों। प्रसन्नचित होकर वे बोले- नारद जी यदि स्वयं विष्णु मेरी कन्या को वरण करना चाहते हैं तो भला मुझे क्या आपत्ति हो सकती है। वे तो साक्षात परम ब्रह्म हैं। सो हे महर्षि यह तो हर एक पिता की इच्छा होती है कि उसकी पुत्री सुख-सम्पदा से युक्त अपने पति के घर की लक्ष्मी बने। पिता की सार्थकता इसी में है कि पति के घर जाकर उसकी पुत्री पिता के घर से अधिक सुखी रहे।

महादेव जी बोले कि- तब तुम्हारे पिता की स्वीकृति पाकर नारदजी विष्णु के पास गए और उनसे तुम्हारे विवाह के निश्चित होने का समाचार सुनाया। किन्तु इस विवाह के संबंध की बात जब तुम्हारे कान में पड़ी तो तुम्हारे दुख का ठिकाना न रहा।
तुम्हारी एक सखी ने तुम्हारी इस मानसिक दशा को समझ लिया और उसने तुमसे उस विक्षिप्तता का कारण जानना चाहा। तब तुमने बताया - मैंने सच्चे मन से अपने स्वामी के रूप में महादेव शिवशंकर का वरण कर लिया है, किंतु मेरे पिता ने मेरा विवाह विष्णुजी से निश्चित कर दिया। मैं विचित्र धर्म-संकट में हूं। अब क्या करूं?
अब अपने प्राण देने के अतिरिक्त अब कोई भी उपाय शेष नहीं दिख रहा है। तुम्हारी सखी बड़ी ही समझदार और सूझबूझ वाली थी। उसने कहा- सखी प्राण तजने का इसमें कारण ही क्या है? संकट के समय पर धैर्य से काम लेना चाहिए। नारी के जीवन की सार्थकता इसी में है कि पति-रूप में हृदय से जिसे एक बार स्वीकार कर लिया, जीवनपर्यंत उसी से निर्वाह करें। सच्ची आस्था और एकनिष्ठा के समक्ष तो ईश्वर को भी समर्पण करना पड़ता है।
मैं तुम्हें घनघोर वन में ले चलती हूं, जो साधना स्थली भी हो और जहां तुम्हारे पिता तुम्हें खोज भी न पाएं। वहां तुम साधना में लीन हो जाना। मुझे पूर्ण विश्वास है कि ईश्वर अवश्य ही तुम्हारी सहायता करेंगे। तुमने ऐसा ही किया। तुम्हारे पिता तुम्हें महल में न पाकर बड़े दुखी तथा चिंतित हुए। वे सोचने लगे कि तुम जाने कहां चली गईं। मैं विष्णुजी से उसका विवाह करने का प्रण कर चुका हूं। यदि भगवान विष्णु बारात लेकर आ गए और कन्या घर पर न हुई तो बड़ा अपमान होगा। मैं तो कहीं मुंह दिखाने के योग्य भी नहीं रहूंगा। यही सब सोचकर गिरिराज ने जोर-शोर से तुम्हारी खोज शुरू करवा दी।
तुम्हारी एक सखी ने तुम्हारी इस मानसिक दशा को समझ लिया और उसने तुमसे उस विक्षिप्तता का कारण जानना चाहा। तब तुमने बताया - मैंने सच्चे मन से अपने स्वामी के रूप में महादेव शिवशंकर का वरण कर लिया है, किंतु मेरे पिता ने मेरा विवाह विष्णुजी से निश्चित कर दिया। मैं विचित्र धर्म-संकट में हूं। अब क्या करूं?
अब अपने प्राण देने के अतिरिक्त अब कोई भी उपाय शेष नहीं दिख रहा है। तुम्हारी सखी बड़ी ही समझदार और सूझबूझ वाली थी। उसने कहा- सखी प्राण तजने का इसमें कारण ही क्या है? संकट के समय पर धैर्य से काम लेना चाहिए। नारी के जीवन की सार्थकता इसी में है कि पति-रूप में हृदय से जिसे एक बार स्वीकार कर लिया, जीवनपर्यंत उसी से निर्वाह करें। सच्ची आस्था और एकनिष्ठा के समक्ष तो ईश्वर को भी समर्पण करना पड़ता है।
मैं तुम्हें घनघोर वन में ले चलती हूं, जो साधना स्थली भी हो और जहां तुम्हारे पिता तुम्हें खोज भी न पाएं। वहां तुम साधना में लीन हो जाना। मुझे पूर्ण विश्वास है कि ईश्वर अवश्य ही तुम्हारी सहायता करेंगे। तुमने ऐसा ही किया। तुम्हारे पिता तुम्हें महल में न पाकर बड़े दुखी तथा चिंतित हुए। वे सोचने लगे कि तुम जाने कहां चली गईं। मैं विष्णुजी से उसका विवाह करने का प्रण कर चुका हूं। यदि भगवान विष्णु बारात लेकर आ गए और कन्या घर पर न हुई तो बड़ा अपमान होगा। मैं तो कहीं मुंह दिखाने के योग्य भी नहीं रहूंगा। यही सब सोचकर गिरिराज ने जोर-शोर से तुम्हारी खोज शुरू करवा दी।

इधर तुम्हारी खोज होती रही और उधर तुम अपनी सखी के साथ नदी के तट पर एक गुफा में मेरी आराधना में लीन रहीं। भाद्रपद शुक्ल तृतीया को हस्त नक्षत्र था। उस दिन तुमने रेत के शिवलिंग का निर्माण करके व्रत किया। रात भर मेरी स्तुति के गीत गाकर जागीं। तुम्हारी इस कष्ट साध्य तपस्या के प्रभाव से मेरा आसन डोलने लगा। मेरी समाधि टूट गई। मैं तुरंत तुम्हारे समक्ष जा पहुंचा और तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न होकर तुमसे वर मांगने के लिए कहा।
तब अपनी तपस्या के फलस्वरूप मुझे अपने समक्ष पाकर तुमने कहा - मैं हृदय से आपको पति के रूप में वरण कर चुकी हूं। यदि आप सचमुच मेरी तपस्या से प्रसन्न होकर आप यहां पधारे हैं। तो मुझे अपनी अर्धांगिनी के रूप में अन्गिकार कर लीजिए।
तब मैं 'तथास्तु' कहकर कैलाश पर्वत पर लौट आया। प्रातः होते ही तुमने पूजा की समस्त सामग्री को नदी में प्रवाहित करके अपनी सहेली सहित व्रत का पारणा किया। उसी समय अपने मित्र-बंधु व दरबारियों सहित गिरिराज तुम्हें खोजते-खोजते वहां आ पहुंचे और तुम्हारी इस कष्ट साध्य तपस्या का कारण तथा उद्देश्य पूछा। उस समय तुम्हारी दशा को देखकर गिरिराज अत्यधिक दुखी हुए और पीड़ा के कारण उनकी आंखों में आंसू उमड़ आए थे।
तब अपनी तपस्या के फलस्वरूप मुझे अपने समक्ष पाकर तुमने कहा - मैं हृदय से आपको पति के रूप में वरण कर चुकी हूं। यदि आप सचमुच मेरी तपस्या से प्रसन्न होकर आप यहां पधारे हैं। तो मुझे अपनी अर्धांगिनी के रूप में अन्गिकार कर लीजिए।
तब मैं 'तथास्तु' कहकर कैलाश पर्वत पर लौट आया। प्रातः होते ही तुमने पूजा की समस्त सामग्री को नदी में प्रवाहित करके अपनी सहेली सहित व्रत का पारणा किया। उसी समय अपने मित्र-बंधु व दरबारियों सहित गिरिराज तुम्हें खोजते-खोजते वहां आ पहुंचे और तुम्हारी इस कष्ट साध्य तपस्या का कारण तथा उद्देश्य पूछा। उस समय तुम्हारी दशा को देखकर गिरिराज अत्यधिक दुखी हुए और पीड़ा के कारण उनकी आंखों में आंसू उमड़ आए थे।

तुमने उनके आंसू पोंछते हुए विनम्र स्वर में कहा- पिताश्री मैंने अपने जीवन का अधिकांश समय कठोर तपस्या में बिताया है। मेरी इस तपस्या का उद्देश्य केवल मात्र यही था कि मैं महादेव को पति के रूप में पाना चाहती थी। आज मैं अपनी तपस्या की कसौटी पर खरी उतर चुकी हूं। आप क्योंकि विष्णुजी से मेरा विवाह करने का निर्णय ले चुके थे, इसलिए मैं अपने आराध्य की खोज में घर छोड़कर चली आई। अब मैं आपके साथ इसी वचन पर घर जाऊंगी कि आप मेरा विवाह विष्णुजी से न करके महादेव से करेंगे।
गिरिराज मान गए और तुम्हें घर ले गए। कुछ समय के पश्चात शास्त्रोक्त विधि-विधानपूर्वक उन्होंने हम दोनों को एक विवाह सूत्र में बांध दिया। हे पार्वती भाद्रपद की शुक्ल पक्ष तृतीया को तुमने मेरी आराधना करके जो व्रत किया था, उसी के फलस्वरूप मेरा तुमसे विवाह हो सका। इसका महत्व यह है कि मैं इस व्रत को करने वाली कुंआरियों को मनोवांछित फल देता हूं। इसलिए सौभाग्य की इच्छा करने वाली प्रत्येक युवती को यह व्रत पूरी एकनिष्ठा तथा आस्था से करना चाहिए।
गिरिराज मान गए और तुम्हें घर ले गए। कुछ समय के पश्चात शास्त्रोक्त विधि-विधानपूर्वक उन्होंने हम दोनों को एक विवाह सूत्र में बांध दिया। हे पार्वती भाद्रपद की शुक्ल पक्ष तृतीया को तुमने मेरी आराधना करके जो व्रत किया था, उसी के फलस्वरूप मेरा तुमसे विवाह हो सका। इसका महत्व यह है कि मैं इस व्रत को करने वाली कुंआरियों को मनोवांछित फल देता हूं। इसलिए सौभाग्य की इच्छा करने वाली प्रत्येक युवती को यह व्रत पूरी एकनिष्ठा तथा आस्था से करना चाहिए।
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