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2014 के बाद से 17 लोकसभा उपचुनाव, बीजेपी सिर्फ 2 में ही जीती

2014 के बाद से 17 लोकसभा उपचुनाव, बीजेपी सिर्फ 2 में ही जीती

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। साल 2014 में नरेंद्र मोदी का जादू इस कदर था कि बीजेपी ने लोकसभा चुनावों में पहली बार 282 सीटों का आंकड़ा छुआ। बीजेपी और नरेंद्र मोदी ने विकास की बात कही और जनता ने इस बात को माना और पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में बैठा दिया। नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने और पूरे देश में 'मोदी लहर' का असर देखने को मिला। अकेले उत्तर प्रदेश में बीजेपी 80 में से 71 लोकसभा सीटें जीतने में कामयाब रही, लेकिन बुधवार को गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव के नतीजों ने सबको हैरान कर दिया। गोरखपुर जहां सीएम योगी आदित्यनाथ की सीट थी, वहीं फूलपुर से डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्या सांसद थे। इन दोनों ही सीटों पर बीजेपी 2014 में 3-3 लाख वोटों के अंतर से जीती थी और 2018 में बड़े अंतर से हार का सामना करना पड़ा। 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद से अब तक 17 लोकसभा सीटों पर उपचुनाव हो चुके हैं, जिसमें से बीजेपी ने सिर्फ 2 सीटों पर ही कब्जा किया है। इसका मतलब 15 लोकसभा सीटें ऐसी हैं, जहां गैर-भाजपाई ने जीत दर्ज की है।

2014 में 5 सीटों पर उपचुनाव
2014 के लोकसभा चुनावों के बाद इसी साल 5 लोकसभा सीटों पर उपचुनाव हुए। इनमें सबसे पहले ओड़िशा की कंधमाल लोकसभा सीट के लिए उपचुनाव हुए थे, जिसमें बीजू जनता दल (BJD) ने बीजेपी को हराया था। इसके बाद तेलंगाना के मेढक में उपचुनावों में TRS और उत्तर प्रदेश की मैनपुरी सीट पर हुए उपचुनाव में समाजवादी पार्टी ने बीजेपी को हराया। हालांकि 2014 में ही गुजरात की वडोदरा सीट पर भी उपचुनाव हुए और बीजेपी अपनी सीट बचाने में कामयाब रही।

2015 में बीजेपी को कोई फायदा नहीं
लोकसभा चुनाव के बाद अगली ही साल यानी 2015 में दो लोकसभा सीट पर उपचुनाव हुए। इनमें पहली सीट तेलंगाना की वारंगल सीट थी और दूसरी वेस्ट बंगाल की। इसमें वारंगल में तेलंगाना राष्ट्र समिति (TRS) ने जीत दर्ज की, तो वहीं वेस्ट बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने उपचुनाव जीता। इस साल बीजेपी कोई फायदा नहीं हुआ। इसके साथ मध्य प्रदेश की रतलाम-झाबुआ लोकसभा सीट पर भी उपचुनाव हुए। 2014 में पहली बार बीजेपी ने यहां से जीत दर्ज की थी। 2014 में कांग्रेस से बीजेपी में आए दिलीप सिंह भूरिया ने कांग्रेस के कांतिलाल भूरिया को 1 लाख से ज्यादा वोटों के अंतर से हाराया। जून 2015 में दिलीप सिंह भूरिया के निधन के बाद यहां उपचुनाव हुए और एक बार फिर से कांग्रेस के कांतिलाल भूरिया ने यहां जीत दर्ज की। कांतिलाल भूरिया पहले भी इसी सीट से 4 बार कांग्रेस के टिकट पर जीत चुके थे।

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                                                                                         (कांतिलाल भूरिया)
2016 में 3 में से सिर्फ एक सीट जीती बीजेपी
इसके बाद 2016 में लोकसभा की 3 सीटों के लिए उपचुनाव हुए, जिसमें बीजेपी सिर्फ मध्य प्रदेश की शहडोल सीट बचाने में कामयाब हुई। जबकि वेस्ट बंगाल की दो सीटें तामलूक और कूचबिहार में TMC ने ही कब्जा किया।

2017 में केवल एक सीट पर हुए उपचुनाव
साल 2017 में लोकसभा की सिर्फ एक ही सीट पर उपचुनाव हुए थे। जिसमें कश्मीर की श्रीनगर लोकसभा सीट शामिल थी। 2014 के लोकसभा चुनावों में इस सीट से PDP के तारिक हमीद ने चुनाव जीता था, लेकिन बाद में इस्तीफा दे दिया। इस सीट पर 2017 में हुए उपचुनाव में नेशनल कॉन्फ्रेंस के फारुक अब्दुल्ला की जीत हुई थी।

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2018 में 5 उपचुनाव और सभी में हार
साल 2018 बेहद खास है, क्योंकि अगले ही साल लोकसभा चुनाव होने हैं। हालांकि बीजेपी के लिए ये साल लोकसभा उपचुनावों के लिहाज से बेहद ही खराब रहा। इस साल 5 लोकसभा सीटों पर उपचुनाव हुए और इनमें से एक भी सीट बीजेपी नहीं जीत पाई। खास बात ये इन 5 में से 4 सीटों पर 2014 में बीजेपी ने कब्जा किया था। इनमें सबसे पहले राजस्थान की अजमेर और अलवर लोकसभा सीटों पर उपचुनाव हुए और इन दोनों ही सीटों पर कांग्रेस ने कब्जा किया। जबकि 11 मार्च को 3 लोकसभा सीटों के आए उपचुनावों के नतीजों में बिहार की अररिया सीट पर राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने जीत दर्ज की, तो वहीं यूपी की गोरखपुर और फूलपुर में समाजवादी पार्टी ने कब्जा किया।

2019 में दिखेगा असर? 
2014 के लोकसभा चुनावों के बाद से बीजेपी भले ही विधानसभा चुनावों में जीतने में कामयाब रही हो, लेकिन लोकसभा उपचुनावों में बीजेपी की हालत बेहद खराब रही। 2014 के बाद से लोकसभा उपचुनावों में मोदी का जादू फीका पड़ गया। इसके साथ ही 2014 के बाद से नरेंद्र मोदी एक भी लोकसभा सीट बढ़ाने में भी नाकामयाब रहे, उल्टा अपनी ही सीटों को गंवा बैठे। उपचुनावों के नतीजों से साफ है कि 2014 में जनता के ऊपर मोदी का जो जादू था, वो अब उतर रहा है और इसका असर 2019 में देखने को जरूर मिलेगा। माना जा रहा है कि 2019 में बीजेपी भले ही सत्ता में लौट आए, लेकिन उसे 2014 के मुकाबले कुछ सीटों का नुकसान जरूर होगा। गोरखपुर और फूलपुर इसका ताजा उदाहरण है। ये दोनों ही सीटें VIP थी और 2014 में बीजेपी ने इन दोनों ही सीटों पर 3-3 लाख के अंतर से जीत दर्ज की थी, लेकिन आम चुनावों से एक साल पहले ही अपने गढ़ में हारने से बीजेपी को नुकसान उठाना पड़ेगा। 

Source: Bhaskarhindi.com

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